मुंडेश्वरी मंदिर की विशेषता जो उसे भव्य बनाती है

मुंडेश्वरी माता मंदिर, बिहार के कैमूर जिले में पवरा पहाड़ी पर 608 फीट की ऊंचाई पर स्थित।
भारत के सबसे प्राचीन कार्यशील हिंदू मंदिरों में से एक माना जाता है। यह मंदिर माता मुंडेश्वरी देवी और भगवान शिव को समर्पित है, जहां शिव और शक्ति की संयुक्त पूजा की परंपरा रही है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अनुसार, इसकी स्थापना 108 ईस्वी में हुई थी, जिससे यह विश्व का सबसे पुराना जीवित मंदिर होने का दावा करता है। हालांकि, कुछ इतिहासकार इसे 4वीं से 7वीं शताब्दी के बीच का मानते हैं, क्योंकि यहां मिले शिलालेख 389 ईस्वी से 636 ईस्वी के बीच के हैं।


इस मंदिर का नाम पौराणिक कथा से जुड़ा है। कहा जाता है कि माता दुर्गा ने चंड और मुंड नामक असुरों का वध किया था। मुंड इस पहाड़ी पर छिप गया था, जहां माता ने उसका संहार किया, जिसके कारण वे मुंडेश्वरी कहलाईं। मंदिर में माता की मूर्ति वाराही रूप में है, जिनका वाहन महिष (भैंसा) है। मंदिर की अष्टकोणीय संरचना और उत्कृष्ट पत्थर की नक्काशी उत्तर-गुप्तकालीन वास्तुकला को दर्शाती है। गर्भगृह में एक पंचमुखी शिवलिंग भी स्थापित है, जो रहस्यमयी ढंग से दिन में सूर्य की रोशनी के अनुसार रंग बदलता है।

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मंदिर की एक अनूठी विशेषता इसकी सात्विक बलि प्रथा है। यहां भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर बकरे को बलि के लिए लाते हैं, लेकिन उसकी जान नहीं ली जाती। पुजारी मंत्रों के साथ अक्षत (चावल) बकरे पर छिड़कते हैं, जिससे वह बेहोश हो जाता है, और फिर उसे जीवित छोड़ दिया जाता है। यह परंपरा इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती है।



ऐतिहासिक रूप से, इस मंदिर का उल्लेख 1812 से 1904 के बीच ब्रिटिश यात्रियों जैसे आर.एन. मार्टिन और फ्रांसिस बुकानन ने किया था। कुछ मान्यताओं के अनुसार, मुगल शासक औरंगजेब ने इसे तोड़ने की कोशिश की, लेकिन असफल रहा, और मंदिर आंशिक रूप से खंडित अवस्था में आज भी मौजूद है। मंदिर परिसर में ब्राह्मी लिपि के शिलालेख और प्राचीन मूर्तियां मिली हैं, जिनमें से कई पटना और कोलकाता संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।

मुंडेश्वरी मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि भारतीय संस्कृति और वास्तुकला का एक जीवंत प्रमाण भी है। यह 1915 से ASI के संरक्षण में है और आज भी भक्तों के लिए खुला है।

Writer _ प्रीति कुमारी 

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